बिडम्बना जीवन की

सभी है सताये हुये जैसे तकदीर के, मालूम ऐसा पड़ता है,
कोई मुँह लटकाये बैठा है, तो कोई सिर झुकाये रहता है।
बात बात पर हो जाती है तकरार, न जाने कैसा खेल होता है,
पल में बदल जाती है नीयत, हर शख्स जैसे गुस्साए बैठा है।

क्या पराया क्या है अपना, न कोई फर्क अब मुझे पड़ता है,
काम निकले कैसे भी सोच यही, दोस्त दोस्त से लड़ता है।
कौन हो तुम कहाँ से आये, काम निकलते ही सवाल करता है,
मेरी हो जाये मौज यारा, मुझे क्या कोई जिये या कोई मरता है।

कोई रूठे कोई छूटे क्या फर्क मुझे पड़ता है यार,
मतलव की है दुनिया जैसे न कोई दुश्मन न किसी से प्यार।
राह में चलते है जब तक, कहलाते हो तुम मुसाफिर,
मिलते ही मंजिल तुम ही राजा अब भला किसका है डर।

अब कहता हूं और तब भी बोला, याद फिर से करो एक बार,
लाख छुपकर करलो पाप, देखता है तेरा खुदा तुझे हर बार।
जीवन मिला है अगर संसार में, फिर सुख दुःख का खेल चलता रहेगा,
सांस उखड़ने भर की है देरी, फिर न तेरी परेशानी न तेरा गुरुर बचेगा।।
pari

© ® Pari....

Love is life......Love is god....Love is everything

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