शब्दों की मंशा

कुछ शब्द चुने थे मैंने भी, कुछ वक्त लगाया था संजोने में,
फिर पिरो दिये कुछ शब्द अलग, कुछ छोड़ दिये तहखाने में।
बहुत हुआ अब खेलना हमसे, अब छोड़ दो कुछ पल तन्हा भी,
नही चाहिए अब और नुमाईश, बस रहने दो कुछ राज जहन में।

वक्त बदला है आज यहाँ भी, कुछ बदलाव हममें भी आने दो,
बहुत लिख लिया झूठ जहाँ में, कुछ सच बयाँ अब करने दो।
रात ढल चुकी धूल छट चुकी, नही अब कोई अंधकार बचा,
पहल हुई है फिर एक नयी, भोर भई है फिर एक नयी।

मौसम बदला आलम बदला, बदलो तुम भी शब्दो की भाषा,
वक्त कीमती हो चला है समझो, पढ़कर आये न कोई निराशा।
कुछ संदेश जहाँ में अब पहुंचा दो, कुछ मरे हुओं को तुम जगा दो,
छोड़ो झूठी शानो शौकत, अब हकीकत खुद में भी आने दो।।
Pari

© ® Pari....


 
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