मेरी चाह पहाड़ी चले पहाड़ की राह

चलो यारो बहुत भटक लिए, बहुत देख लिया शहर की चकचौन्ध,
खोलो आंखे सुनो दिल की, आओ चलो फिर से अपड़ा पहाड़ की ओर।
Pari

ऐ जाओ बौडी की च धै लगाणी या पहाड़ की माटी हे दिदो तुम खुणी,
किलै छा भटकणा खैरी मा अभी भौत च मि मा प्यार-उलार त्वे खुणी।
Pari

किलै खा रहे हो केमिकल यख, किलै फेफड़ों मा धुआँ भोर रहे हो,
छैंच जब इतनी सम्पदा घर मा, किलै तब दूसरों मा काम मांग रहे हो।
नॉट कमाणा खुणी इतनी सिद्दत से अपड़ी सेहत दाव पर लगा रहे हो,
फिर अंग्रेजी दवा दारू का खातिर वी नॉट अस्पतालों में लुटा रहे हो।
क्या सोचणा तुम की खै की खैरी यन भविष्य उज्जल होलु तुमरा नौनकु,
पर असल मा स्वस्थ हवा पाणी बिना बिष जीवन का घोलणा छ तुम।
अभी भी चेती जाओ अभी बिन्डया देर नि ह्वे मेरा भैजी भुलो,
जागा अर उठाओ खुटा फिर देवभूमि पहाड़ की तरफ जाणकु।।
Pari

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