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लाडली सरकार

मै अक्सर रात को लिखता हूं, शायद रात ही मेरी दोस्त है, मेरी तनहाई मदद करती है, कि मैं खुद से मिल सकूं कुछ पल। शांत वातावरण और मै, मन भी शांत और तन भी शान्त, फिर उठता है गुबार कोई, फिर तमाम हमाम अशांत।। कोई आता है फिर ख्वाबों में, तनहाई हर ले जाता है, मुझसे मेरी बाते करता है और खुद एक राज बना रहता है। धीरे धीरे नींद खुलती है, और सपना ओझल हो जाता है, सारी ख्वाइश खो जाती है, फिर से एक भोर हो जाती है।। कल रात को मैने सोचा उसे या फिर वो खुद आई थी, मुझसे मिलने की बात थी कोई, या याद दिलाने आई थी। पल पल मेरा चैन चुराया और फिर दूर कही वो खो जाती है, रोज रातों को सपने में आकर, सुबह कहीं ओझल हो जाती है।। मेरा उससे प्रेम अटल था, या वो मेरी बस एक ख्वाइश थी, सूने मेरे जीवन में बस, वही सावन सी एक बारिश थी। धीरे धीरे वह सपना भी टूटा, वर्षों का अपना साथ भी छूटा, बुलंद सितारे लिए फिरता था, एक दिन वो मेरा गुरूर भी टूटा।। अब कोई बाकी ख्वाइश नही है, उसे पाने की गुंजाइश नहीं है, तनहा जीवन अच्छा लगता है, बिन उसके सब सच्चा लगता है। जीवन का अब एक ही सार है, प्रेम करना करवाना बेकार है, दुनिया से मन ऊब चुका, अपनी...

बस यूहीं ख्याल से

वक्त गुजर जाता है मुट्ठी से रेत की तरह, खास भी दूर हो जाते है अजनबी की तरह। फिर भी कुछ यादें जहन में रह जाती हैं, और फिर तनहाई में रह रहकर सताती है।। Pari ✍️ बरसात का मौसम, हरियाली चारों ओर.. भीग गए अगर बारिश में फिर मन भावविभोर। दूर खड़े क्यों देख रह बारिश की इन बूंदों को, पास आओ गले लगालो मौसम की इस साजिश को..।। फिर ये मौसम न आयेगा, आयेगा तो हम न होंगे, न फिर ये उल्लास होगा, दिन ये फिर बीत चुके होंगे। फिर सोचोगे बैठे अकेले, वो भी क्या दिन थे अपने, आंखों में थी आस बड़ी, अपने थे वो सब सपने।। Pari ✍️

हर सजा मंजूर तेरी

क्या यार फिर से तूने वही बात करना शुरू कर दिया, अगर मुलाकात न हुई अपनी तो मोहब्बत को नकार दिया। माना कि कुछ गलत मै भी हो सकता हूं इनकार नहीं है, लेकिन ऐसा भी क्या कि तूने पहचानने से मना कर दिया। मेरी हर बात तुझे झूठी लगी, मेरी आंखो में सच्चाई न दिखी, मैं था हर बार बेकसूर लेकिन तुझे बस मेरी गलती ही दिखी। मेरा इरादा था हमेशा ही तुझे खुश रख सकूं ताउम्र मेरी जान, लेकिन तूने तो मेरे में बस खामियां ही हर बार ही खोजी। वो छोटी सी छोटी नोक झोंक भी जैसे कोई बबाल बन गया, तेरी हर लापरवाही को नजरअंदाज हर बार ही मैने था किया। जब जब तूने कुछ ख्वाइश की, सोच से पहले उसे मैने पूरा किया, फिर भी इतनी परवाह के बाद तूने मुझे खुद से दूर ही तो किया।। सच कहूं तो बस तेरे प्रेम के खातिर ही तेरे पास रह रहा हूँ, हर बार ठुकरा दिया जाता हूं, फिर भी घूंट ये जहर पीए जा रहा हूँ। न जाने कब तक लेकिन हां वादा है तुझसे जान है ये मेरी जब तक, बस तुझी से मोहब्बत रहेगी, दिल में एक तेरी तस्वीर मिलेगी।। Pari ✍️ 

तेरा अधूरा खत आखिरी

आज लिखा था उसे आखिरी पैगाम, और खत के ऊपर उसका नाम, पहला अक्षर उसके नाम का और दूजे में थी कुशल उसकी। धीरे धीरे आगे बढ़ते लिखा, सारी गलती मेरी थी, न थी कुछ भी उसकी। फिर याद आ गया वादा उसका, और फाड़ दिया मैने वह एक पन्ना।। फिर से शुरू किया दूजे पन्ने में, और पहला अक्षर ही लिखा प्रिये , आशा है तुम सकुशल होंगी, घाव ताजे हैं अभी तुमने थे जो दिए। नाम तुम्हे अभी याद तो होगा, शायद कुछ यादें भी होंगी ताजा, लेकिन यह खत अंतिम होगा, चाहो तो इक बार मिलने आजा। थोड़ा फिर रुककर सोचा, अगर गई होगी वो मुझको भूल, खत फिर वापिस आ जाएगा, चुभेगा ऐसे मुझे जैसे कोई शूल। मेरी गलती मुझे खलेगी, मैं ही प्यार में था क्या भोला भाला, वो तो फिर से कह देगी....,देखो छेड़ रहा यह निखट्टू साला।। कुछ आखर थे लिखे जो मैने, लिख लिखकर के मिटा दिये, घाव अभी भी थे जो गहरे, खुद ही खुद फिर मैने सिये। उससे अब क्या इल्म रखूं, खत भी उसके सब जला दिये, खुद ही खुद में रहता हूं अब, राज वो सारे दिल में कैद किए।। Pari ✍️ 

कुछ फैसले जो गलत किये शायद हमने..!

भारी मन से निकले हम, छोड़कर अपना घर कुछ बेड़ियां तो तोड़कर कुछ रिश्तों को पीछे छोड़कर वो लड़कपन की बात, वो सावन की बरसात, कुछ जिंदगी को भूल निकल आए हम तेरे शहर। ख्वाहिशें अनेक लिए, पैरों को ज़मीं पर धरे निकल आए हम स्वर्ग छोड़कर तेरे बेजान शहर वो खुशबू पहाड़ की, महक वो गांव में हवा की,  वो पहाड़ वो नदियां और मोहब्बत किसी की। वो गले लगती राहें, वो खुशी में खुली उसकी बाहें, वो सरसराती हवा ठंडी, वो प्रेमी से बिछड़न की आहें। छोड़कर निकले हम वो सुहाने दिन और वो ख़ामोश रात, सोचकर निकले उस दिन, कि पा जायेंगे एक दिन कायनात।। शहरों की खाक छानी, बन गया अपना खून भी पानी, बुढ़ापा साथ लिए जा रहे, छोड़ कहीं वो अपनी जवानी। न ख्वाब ही पूरे हुए कोई, न मिल सकी वो सपनो की रानी, बस समय कटता गया, और लूट गई अपनी सारी रवानी।। अब सोचकर वो दिन, बस खामोश बैठ जाता हूं, निकले थे जो कदम उस दिन, न रोक पाने की कीमत चुकाता हूं। अब तो बस आसमा को देख पुरानी यादों को जी रहा हूँ, जो घाव दिए जिंदगी ने, उन्हीं के आंसू पीए जा रहा हूँ।। Pari ✍️ 

समय की अनोखी चाल

मुस्कान चेहरे पर अक्सर है आती, दुनिया की ये तस्वीर है हसाती, व्यक्ति विशेष का निर्णय होता, फिर शब्दों की है परिभाषा बदलती। मेरा मन जो चाहे वही सही है, दूसरे की मंशा को आंख दिखाती, मेरा वकतव्य रहे ऊपर हमेशा, यही चाहत अब दिल मे घर है करती।। त्यौहारों का मौसम है अब, हर दूजे दिन उत्सव होगा, भूले बिसरे रिश्ते वादों को, फिर से जीने का वक्त मिलेगा। लेकिन बात सिर्फ इतने तक, नहीं सिमट के रह जाएगी, खुद को ऊँचा और तुझको नीचाँ, दिखाने की भी कोशिश की जायेगी।। मैं तो कहता हूं अब भी वक्त है, समय का फेर समझो अब तो, नष्वर शरीर और है वक़्त चलायमान, इसकी चाल को तुम तो बूझो। फिर न समय पास में होगा, सिर्फ खुद के निर्णयों में उत्तर होगा, रात ढलेगी दिन बदलेगा, समय न फिर एक सा होगा। परिवार बचाओ संयम से, हर बार ऐठन ठीक नहीं, मतों का तुम मतभेद रख लो, मन भेदों में पड़ना ठीक नहीं। सारी दुनिया भूल जाती है, अगर तुम्हारे तुमसे रूठ गए, परायों से फिर क्या ही मिलेगा, जब देखोगे रिश्ते अपने छूट गए।। समय का तो है खेल निराला,  हर दिन बदले अपनी चाल, कभी करे वो खींचातानी, तो कभी तलवार को भी बना ले ढाल। मन की...

सब कुछ सबको नहीं मिलता

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लाख कोशिश करो तुम, फिर भी कुछ तो अधूरा रह ही जाएगा, सब कुछ करने की चाह में, कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा। जो मिला है उसका लुफ्त उठाओ, वही तुम्हे खुशियां दे जायेगा, सब कुछ की चाह में एक दिन, सब कुछ ही मिट जाएगा।। एक फूल खिला था उपवन में, सुंदर था सबसे वो वन में, गुरूर था उसको खुशबू पर, भंवरे की उसपर चाहत में। एक रोज वो फिर मुरझा गया, भंवरा उड़कर दूर चला, कब सूखे फूलों पर भौंरे टिकते हैं, उपवन देख अब मुस्कुरा रहा।। सावन की बदली छा जाती है, चहूं ओर बसंत ले आती है, देख मौसम की रंगत को, चिड़िया भी निशदिन चहकती है। सावन भी एक दिन खत्म हुआ, पतझड़ को जैसे उसने न्योता दिया, समय की अदला बदली को, फिर सावन ने भी प्रणाम किया। मानव का भी बस ऐसा जीवन है, कुछ पा लेता है कुछ खो जाता है, लेकिन खोने पाने में क्या, वह संघर्ष कहीं करना छोड़ देता है। हर वक्त वह लड़ता है हालात से, फिर जीत का सेहरा सिर होता है, ज्यादा की तो चाह हमेशा रहती है, लेकिन थोड़ा भी कुछ कम नहीं होता है।। कह भी जाओ और अगर कर भी जाओ, भुलाये तुम फिर भी जाओगे, लाख बना लो महल मकान, राख में ही आखिर फिर मिट जाओगे। तेरा मेरा कर लो कितना, बालक परि...