देशहित पहला कर्तव्य

अक्सर मैं भी मुस्कुरा देता हूँ, हालत खुद की देखकर,
देशभक्त बन बैठे हैं कुछ आज, ईमान खुदका बेचकर।
कृपा करना अपनी केशव, बचे रहे इंसानियत जहाँ में,
मतभेद रखना आपस में पर, मनभेद का खेल न खेला जाये।।

सत्ता के गलियारों का, स्वाद सभी को है भाता,
लजीज बिरयानी खाने को, हर सयाना है यहाँ आता।
गर्दन तक हो कीचङ में सने, फिर भी कुर्ता है चमकाता,
लाखों करोड़ो चटकर जाता, और मजाल जो एक डकार हो आता।

मैं ही सच्चा मैं ही काबिल, बस एक दौड़ है जैसे ओलम्पिक की,
कुर्सी के लालच के खातिर, होड़ लगी है बस नींचपन की।
कोई चोर तो कोई सिपाही, खुद को सर्वोपरि समझते हैं,
लोकतंत्र के स्तंभ है जनता, वादों से निशदिन उसको भरमाते हैं।।

लेकिन हमको क्या करना है, लड़ने दो नेताओ को,
मुफ्त में कोई भीख जो दे दे, खा जाओ बस चुपकर के।
देशहित से हमें क्या लेना है, अपना स्वार्थ सिद्द होना जरूरी है,
धिक्कार है ऐसे लोगो पर , जिनके लिये देश ज्यादा चमचागिरी जरूरी है।

ताज्जुब नहीं है कुछ भी, पढ़े लिखे तो ज्यादा अनपढ़ है,
सच दिखता है सामने फिर भी, आँखों मीच हो रहे अंधे हैं।
सही सोच और सही निर्णय अगर, लेने की तुममे क्षमता नहीँ,
न आजादी और न देश विकास, गुलामी ही फिर तुम्हारे लिये सही।

सरदार चुनो उसकी काबिलियत देख, खानदान से क्या लेना है,
कुँए के मेडक क्यों बनते हो, समुद्र में नाव को खेना है।
खुले विचारों संग निकलो घर से, फिर परिचय संसार से होगा,
एक एक बूँद से बनेगा सागर, सोच बदल निर्णय लेना होगा।।
Pari

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