अतुलनीय देवभूमि, उत्तराखंड???????

क्या कहूँ और कैसे कहूँ थोड़ा सा मैं बेचैन हूँ,
अनेक युवा संग राजनेता चिंतित है मेरे लिये।
कही सभायें होती है, कही व्यंग भी करते है,
फिर न जाने क्यों मेरा दुख नित बढ़ता ही है।।

निशदिन जाने कितने ही लोग, मेरी ब्यथा को लिखते है,
फिर कोशिश कर उस व्यथा को, जन जन तक ले जाते हैं।
कुछ कवितायें लिखते हैं, कुछ नारे जोर शोर से देते हैं,
फिर भी देखो बिडंबना, मेरे दुख नित बढ़ते ही है।

इतने सब प्रयासों से भी, क्यों बदलाव नही आता है?
पलायन की जो मार पड़ रही, दर्द क्यों नही ये घटता है?
क्यों सब प्रयास विफल हो रहे, क्यों मेरा सीना रोज चोट खाता है,
सच में अगर मेरे अपने चिंतित है, फिर क्यों विकास नही होता पाता है??

सोचा मैं भी कुछ व्यंग करूँ, फिर चेहरे पर सोच आयी मुस्कान,
अपना अपना विकास देख रहे सब, कब आया किसी को मेरा ध्यान।
बेहतर जीवन पाने को आज, त्याग कर हैं सब मेरा,
फिर दूर देश विदेश मे बैठकर, मुझपर गर्व का सब देते हैं नारा।

कुंठित मन हो चला है मेरा, उम्मीद भी टूट रही अब,
क्या कविता, धरना, नारो से, मैं फिर हरा भरा हो पाउंगा।
जो मेरे अपने छोड़ चले, क्या कभी उन्हें मैं फिर मिल पाउँगा,
क्या मेरा अस्तित्व बचेगा, या फिर किताबो तक सीमित हो जाऊंगा?

तकनीकी ज्ञान बढ़ाओ माना, लेकिन अपनी जड़ों को मत काटो,
कितना भी बढ़ जाओ आसमाँ पर, लेकिन खुद को जमीं से मत बांटो।
खुद से करो एक सवाल आज तुम, क्या सच में तुम चिंतित हो,
जवाब मिले तो लिख देना, क्या मेरे अलावा तुम कहीं सुरक्षित हो??

सिर्फ जन दिखावे के लिये, फिक्रमंद न होना मेरे अपनो,
विष घुल रहा जीवन मे तुम्हारे, समय मिले तो अमृत पी जाना।
मिट जाएगा अस्तित्व एक दिन मेरा, इस छलावे में मत आना,
जब भी कदम डगमगा जाये, फिर वापिस घर को आ जाना।।

अब तुम फिर पूछोगे मुझसे, क्यो मैं इतना तुमसे कहता हूं?
अपनी अपनी सोचो तुम, क्यों भला मैं तुमसे जलता हूँ?
सुनो जरा तुम अब मुझसे, पहचान है हमारी संग रहकर,
हुम दोनो है अधूरे आज, यूँ अलग अलग अब रहकर।
मेरा हृदय है दुखता आज, जब तुम मेरी सुध तक नही लेते हो,
और ज़ोर शोर से नारो कविताओं में, अपनी पहचान देवभूमि को कहते हो।।

क्योँ झूठी तस्सली देते हो, और क्यों झूठे वादे करते हो,
खुद हो दूर अन्य शहरों में, फिर औरो को नसियत देते हो।
हिम्मत है तो कदम उठाओ, जीवित करो अपने ग्राम को,
मुझे भी होगा फिर गर्व तुमपर, कुछ ऐसा अगर तुम कर दिखलाओ।।

व्यथा अधिक है मेरी भी अगर, मैं भी लिखने पर आ जाऊं,
पर सिर्फ लिखने से क्या होगा, अगर आंखों में आँसू ले भी आऊं।
मैं उत्तराखंड देवभूमि तुमसे अधिक, फिर भी सिर्फ नाम से जाना जाऊंगा,
मैं यहीं खड़ा हूँ आज भी कल भी, सदैव अतुलनीय कहलाऊँगा।।
Pari

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