प्रेम ही जीवन सुख है

कलम उठायी फिर से आज, दिन बीते हैं बिन अनेकों साज,
मन व्यथित था कुछ रोज से, शायद तेरी बिछड़न की सोच से।
हिम्मत कर फिर कलम उठायी, खोला एक फिर पन्ना आज,
लिख डालूँ सब मंशा मन की, लिख डालूँ दिल के सब राज।।

प्रेमवश होकर सबको अपना जाना, प्रेम ही सबको बाँटा निशदिन,
प्रेम भाव से कर्म किये हैं, मनुष्य मिले जीवन मे भिन्न भिन्न।
पिरो दिये थे मोती अनंत कुछ मंगलमय की कामना में,
पग पग पाँव रखे फिर संभल, ज्यों छाले हो पांव में।।

फिर से होगा नव सवेरा जीवन में, उम्मीद तिमिर के जाने की,
प्रेम के गीत रचे फिर मैंने, आस प्रेम जगत को पाने की।
राह कठिन है माना मैंने, लेकिन निष्चय मेरा भी अटल होगा,
प्रेम ही जीवन का अनन्त सत्य है, प्रेम ही मेरा धर्म भी होगा।।

मेरी हर कृति में प्रेम दिखेलु, सर्वजन हिताय संदेश दिखेलु।
अपना पराया सीमा छोड़, परोपकार से नाता होगा,
मेरी हर ख्वाइश में प्रेम मिलेगा, मेरी हर इच्छा में प्रेम दिखेलु।
तुम भी कोशिश अनुसरण करना, जीवन मे बस प्रेम ही भरना।
Pari

© ® Pari....

Love is life......Love is god....Love is everything

Comments

Popular posts from this blog

कुछ कल्पनाओं के शहर

पहाड़ और पहाड़ी बचाओ

व्यथा आज पहाड़ की