मेरु ज्यू मेरु प्राण, मेरु गांव मेरु मुल्क

कन भलु प्यारू मेरु उत्तराखंड, कन भली हमरी बोली भाषा,
कतगा भला हमरा रीति रिवाज, कतगा हमरू प्यारु समाज च खास।
बनि बनी का यख रंग रूप छन मिलदा, बनी बनी का यख बिचार,
कखी बीरों कु संगर्ष च यख, त कखी प्रेम की गाथा च अपार।

ऋतु बितीन बीती गैनी साल, सैंणा बाटा भी देखा हुयान भ्याल,
गौला लगी भिटे जांदा छाई जू, आज वी नॉला पंदेरा पूछण लग्यान सवाल।
कनु कै की तिन मुख मोड़ी हमसे, कनु कै तिन हमथै बिसराई,
आँख्यू मा क्या आंसू नी आया तेरा, कनू कै त्वे पिडा भी नी ह्वाई।।

बांजा पोड़ीन सेरा पुंगडा जब त्यारा, तेरी गाती का कांडा नी चुभिन,
छोड़ी की गई जब तू स्वर्ग तब, तेरी खुटयूं मा ग्वाला नी पोड़ीन।
कख छन तेरा अपना बिरणा बोला, कख च तेरू मान सम्मान,
किले इतगा निर्मोही तेरू ज्यू ह्वे, कख तेरू हर्ची बल वो इमान।

दिन बीती जाला बिती जाला साल, कुछ गौं खाली ह्वेन कुछ होला भ्वाल,
कुछ आज चिंतित छन कुछ भोल होला, पर क्या मिललु कैरी की बस सवाल?
मेरी सोच मेरु प्राण आज भी बस्युं च बस मेरा गों मेरा पहाड़ मा,
ब्याली भी छाई और भोल भी रौलु मी प्रयासरत, अपडा मुल्क का पुनः निर्माण मा।
Pari

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