स्वतंत्रता दिवस की महक

राह नहीं आसान थी वो, फिर भी खुद को तैयार किया,
काँटों से पथ था भरा हुआ, फिर भी मुस्कुरा चलने का निर्णय किया।
लेकर जान को हाथों में तब, देशहित को अपना कर्तव्य बना लिया,
लाखों कुर्बानियो का फल था यारों, यूँही नही आजादी का पुष्प खिला।।

लाखों जिंदगियो ने दाव था खेल, लगा हुआ था मौत का मेला,
मिलनी थी आजादी जीत में, हार गये तो जान थी जानी।
नही फिक्र अंजाम किये फिर, खेल सबने जी जान से खेला,
किसी ने सुख चैन गवाया फिर, तो किसी ने गवा दी थी जवानी।।

रात दिन का होश नही था, न फिक्र थी कोई जीवन जीने की,
मिला हाथ फिर सब देशभक्तों ने, पाने आजादी की कसम थी खानी।
नहीं था कोई धर्म का पहरा, बस राह पकड़ी थी अब देशधर्म की,
तोड़ दीवारें रिस्ते नातों की, अब निकल पड़े सब स्वराज दिलाने।।

न जाने कितनी माँगे सूनी हुयी, न जाने कितने बच्चे अनाथ हुये,
पाने स्वराज को अपना यारो, न जाने कितने मा बाप बेसहारा हुये।
जरा संभाल कर रखो इसे, बहुत ही महँगी मिली बिरासत,
प्रेम भाईचारे संग रहो मिलजुल, कहीं खो न जाये ये सौगात

जय हिन्द जय भारत
Pari

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