त्याग सिया सा कर पाओगे क्या?

कैसे मानूँ तेरी हर बात को मैं,
मेरी हर बात पर यकीं तुम रख पाओगे क्या..?
कह दूं अगर मैं दिन को भी रात,
आँख मूँद तुम सब हां कह जाओगे क्या?

यूँ तो होगीं सुहानी रातें अक़्सर ही,
पर काली घनी रातों में भी साथ निभा पाओगे क्या..?
निशदिन ही आएंगे छलने तुन्हें छलावे बहुत,
मेरी निष्ठा पर तुम अडिग रह पाओगे क्या..?

माना तुमने किया समर्पित मुझे जीवन अपना,
मैं भी बस तुममें ही हुँ, दिल को अपने समझा पाओगे क्या?
मोहब्बत का जो रिस्ता है ये अटूट सा अपना,
जीवन भर इसे निभाने की कसम ले पाओगे क्या?

मैं भी करता हूँ कोशिश हर पल,
बात इसे तुम महसूस कर पाओगे क्या?
दे जाऊँ अगर खुशियां तुम्हें दुनियाभर की,
सबको तुम झोली में समेट पाओगे क्या?

हर पल ही है तुन्हें शिकायत मुझसे,
खुद को बेकसुर तुम रख पाओगे क्या?
कुसूर कुछ मेरा तो कुछ तेरा भी होगा,
खुद को कोई सजा तुम स्वयं दे पाओगे क्या?

शंकर जैसे विष अगर मैं पी भी जाऊँ
पार्वती सा तप तुम कर पाओगे क्या?
कान्हा जैसा प्रेम अगर मैं कर भी जाऊं,
राधा जैसी प्रीत निभा पाओगे क्या?

माना कि है उम्मीदें तुन्हें बहुत,
लेकिन उसे तुम खुद पूरा कर पाओगे क्या,
चाह है तुम्हें कि मैं राम सा बन जाऊं,
लेकिन सिया जैसा त्याग तुम कर पाओगे क्या?
Pari✍️

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