गौं गुठयार खाल धार

पुंगड़ी अपड़ी बांजा छोड़ि, मोल कु क्वादो लाणा छिन,

आँखा बूजी की सियाँ भितरी, धुरपली मा बन्दर नचणा छिन।

डाली बोटी सुखी गैनी आस मा, अब दुकानी सारा बैठ्या छिन,

पन्देरा सुखी बाटो जूँकु देखी, वो नलखों मा पाणी खुजयाणा छिन।।


न कौथिग गैनी न जलेबी खैनी, आज वो दिन खुजयाणा छिन,

न रामलीला देखी न देवता नचै, अब धारुं मा भूत पूजण छिन।

न गोर चरैनी न कभी धै लगैनी, आज द्वी बात सुनण कु तरसणा छिन।

खैरी नि खायी पिड़ा नि साई, आज एक गालु भी नि उघड़ सकणा छिन।


ख्यालूँ म च गौं गाण्यूं म छन लोग, घौर बस अब यादु म च,

आस भर मा छन अपड़ा, बिरणों से क्या आस लगाण तब।

जब खलयाँण ही खाली छन, फिर थैला का सारा क्या कन,

समय फर बिजी जाओ त ठीक, पाछ उठी फिर कुछ नि मिन..

Pari



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