बस यही आरजू है तुझसे

न जाने क्यों ऐसा एहसास तूने पैदा किया,

तनहा ही था रहना तो फिर क्यों दिल दिया।

शिद्दत से चाहा जिसको भी जीवनकाल में,

वही हर बार चोट कोई गहरी मुझे ही दे गया...


मेरे जहन में है कई कई घाव ताजे अभी,

मैंने छोड़ दी है करना अब मरहम पट्टी भी।

अब तो हल्का हल्का सा दर्द भी रास आने लगा है,

तेरा दिया हर दर्द जैसे तेरी याद बनने लगा है।।


मुझे था यकीन की तुम मेरे हर फैसले में साथ दोगे,

सोचा न था यूँ वादों से इतनी जल्दी मुहँ मोड़ लोगे।

लेकिन अच्छा है समय से मैं भी संभल जाऊं अब फिर,

छोड़ मोहब्बत गुमनाम सा खो जाऊं मैं भी अब फिर।।


बहुत रो दिये तुम हे प्रिये मेरे लिये,

बहुत दुःख तुमको मैंने हैं दे दिये।

तुझसे बस अब एक और आरजू है,

अगर तुम इतना कर सको मेरे लिये। 


बेवजह न रोना अब कभी मेरे लिये.

चाहे तन से निकल जाये प्राण मेरे भले..।।

Pari✍️


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