मेरी कविता मेरे शब्द

मैं यूहीं तो शब्द संजोता नही था, शायद कोई किताब होना बाकी थी,
वक्त बेवक्त कुछ लम्हें लिखता था, फिर यादें जो अताह बनानी थी।
कुछ जज्बातों को उतारा है मैंने, कुछ को यूहीं भुलाना सही समझा,
जो दे दिलो को सुकूँ संजो दिया, बेचैनी को बस स्वयं तक सीमित कर दिया।

आये फिर लम्हें कुछ ऐसे भी, मन मेरा भी हुआ प्रफुल्लित,
आशाओं का ज्वार उठा, देख मेरा मन हुआ प्रशनचित।
कोई सुन्दर सा सपना फिर, मेरी भी निंद उड़ा गया,
कुछ अच्छा लगा मुझे भी फिर ,जैसे जीवन का रुख गया।

कुछ लम्हों को संजोने की कोशिश थी, कुछ अनचाहे लम्हें मिल गये,
दिल की चाहत पूरी न हुयी, कुछ अपने न जाने कहाँ खो गये।
बेकल ही होती है पूरी ख्वाहिशें, बाकी सब सपना ही बना रहता है,
पल पल समय गुजरा जैसे रेत हाथों से, बस काश बाकी बचा रहता है।

मेरी हर पंक्ति का हर शब्द मेरी कहानी होगा, ये जरूरी तो नही होगा,
लेकिन मेरे अनुभव मेरी कल्पना को जरूर कविता का रूप देगा।।
Pari

© ® Pari....

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