यादों की वो बात
कैसे भूल जाऊँ वो बचपन मे बिताये दिन,
वो पीपल की छांव थी वो बाबा जी का डर।
अक्सर ही तो तेरी याद आती है यहाँ मुझको,
आँखें होती है नम सोच बात उन दिनों की फिर..
वो बालपन था मेरा वो घुटनों के बल चलना
वो मिट्ठी में गिरना और फिर वो मिट्टी को ही चरना।
मिट्टी में लतपत वो चेहरे का हो जाना,
वो मासूमियत से फिर माँ की राह को तकना...
दिन फिर बीते कुछ और बचपन के,
घुटनों को छोड़ शुरू फिर किया चलना पैरो से।
कभी खायी चोटें गिर उठकर लड़कपन में,
वो दादी के दुलार में दादा जी के लाड में..
बिताये दिन फिर वहीं गांव की पाठशाला में,
वो मौज थी यारो संग कभी मास्टर जी की डांट में।
चुराये आम तो कभी सेब लड़कपन में बागों से,
न जाने स्वाद कैसा था अपने छोड़ पराये खेतों मे।
अब तो बस याद बाकी है सब जैसे कोई सपना हो,
नींद में थे गहरी किसी ने आज नींद से जैसे जगाया हो
यादों में ही बस अब तो वो पेड़ों की छाँव गांव की,
वो कच्चे रास्ते ..वो खिलखिलाता आंगन गांव का।
Pari✍️
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